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नई दिल्ली। दिल्ली की 135 साल पुरानी सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी (CSL) इन दिनों चर्चा में है। करीब 8.5 लाख से ज्यादा किताबों, दुर्लभ पुस्तकों, सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड को समेटे इस लाइब्रेरी के भविष्य को लेकर उठे सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। अदालत इस मामले की सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को करेगी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ करेगी।यह पूरा मामला सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत शास्त्री भवन के प्रस्तावित पुनर्विकास और लाइब्रेरी को वहां से हटाए जाने से जुड़ा है। शास्त्री भवन में फिलहाल सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी चार मंजिलों में करीब 5,500 वर्ग मीटर क्षेत्र में संचालित हो रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा था कि इतनी बड़ी और ऐतिहासिक लाइब्रेरी के विशाल संग्रह को नई जगह पर किस तरह सुरक्षित रखा जाएगा और उसके लिए पर्याप्त स्थान कहां होगा।
1891 में हुई थी शुरुआत
सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी का इतिहास बेहद पुराना है। इसकी शुरुआत 1891 में कोलकाता में ‘इंपीरियल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी’ के तौर पर हुई थी। 1911 में जब ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की, तब यह लाइब्रेरी भी दिल्ली आ गई। बाद में यह नॉर्थ ब्लॉक में संचालित हुई और 1969 से शास्त्री भवन में है। इस तरह यह सिर्फ एक सामान्य सरकारी पुस्तकालय नहीं, बल्कि देश के प्रशासनिक और बौद्धिक इतिहास से जुड़ी संस्था है।लाइब्रेरी के संग्रह में 8.5 लाख से ज्यादा किताबें हैं। इनमें दुर्लभ पुस्तकें, सरकारी प्रकाशन, आधिकारिक रिकॉर्ड, गजटियर और ऐतिहासिक सामग्री शामिल है। रिपोर्टों के मुताबिक इसका पुराना और दुर्लभ संग्रह देश के प्रशासनिक इतिहास तथा शोध के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत शास्त्री भवन को खाली कराया जाना है। 17 सितंबर को केंद्रीय लोक निर्माण विभाग यानी CPWD ने शास्त्री भवन में स्थित मंत्रालयों और विभागों को परिसर जल्द खाली करने को कहा था। पत्र में भवन को सितंबर के अंत तक निर्माण कार्य के लिए सौंपे जाने की बात कही गई थी। इसके बाद लाइब्रेरी की नई जगह को लेकर चिंता और तेज हो गई।मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जनवरी 2026 में आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के तहत संपदा निदेशालय ने कार्तव्य भवन-2 में लाइब्रेरी के लिए दो कमरे आवंटित करने का प्रस्ताव दिया था। इन दोनों कमरों का कुल क्षेत्रफल करीब 300 वर्ग मीटर बताया गया। लेकिन संस्कृति मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को अपर्याप्त माना। उसका तर्क था कि इतनी कम जगह में 8.5 लाख से ज्यादा पुस्तकों के पूरे संग्रह के साथ पढ़ने की सुविधा, कर्मचारियों और अन्य जरूरी ढांचे को समायोजित करना संभव नहीं होगा।
संस्कृति मंत्रालय ने मांगी थी ज्यादा जगह
रिपोर्टों के अनुसार संस्कृति मंत्रालय ने पहले ही इस मुद्दे को सरकार के सामने उठाया था। सितंबर 2023 में तत्कालीन संस्कृति सचिव ने नए केंद्रीय सचिवालय परिसर में लाइब्रेरी के लिए करीब 5,466 वर्ग मीटर जगह देने का अनुरोध किया था। साथ ही ऐसी इमारत की मांग की गई थी, जिससे सेंट्रल विस्टा में मौजूद विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के लिए लाइब्रेरी तक पहुंच आसान रहे।इसके मुकाबले 300 वर्ग मीटर की प्रस्तावित जगह बेहद छोटी मानी गई। संस्कृति मंत्रालय ने फरवरी 2026 में स्पष्ट किया कि निर्धारित जगह लाइब्रेरी के पूरे संग्रह और सुविधाओं के लिए पर्याप्त नहीं है और इस स्थान पर पूरी लाइब्रेरी को स्थानांतरित करना संभव नहीं होगा।
अब सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया। अदालत में मामला इस शीर्षक के साथ दर्ज किया गया है—“In Re: 135-Yr-Old Library 8.5 Lakh Books - And No Room In The New Central Vista Plan”. यह मामला 3 अक्टूबर 2026 को रजिस्टर किया गया और 5 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।अदालत का संज्ञान ऐसे समय में आया है जब शास्त्री भवन के पुनर्विकास और वहां से विभिन्न संस्थानों को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। अब यह देखा जाएगा कि इतनी बड़ी ऐतिहासिक लाइब्रेरी के संग्रह और संचालन के लिए सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।
सरकार ने कहा- लाइब्रेरी के लिए जगह दी गई
इस बीच आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने मीडिया में आई उन खबरों का जवाब दिया है जिनमें लाइब्रेरी के लिए नए सेंट्रल विस्टा प्लान में जगह नहीं होने की बात कही गई थी। मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को कहा कि कार्तव्य पथ पुनर्विकास योजना में सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी के लिए जगह का प्रावधान किया गया है और इसके निर्माण से जुड़ी आवश्यक प्रक्रिया चल रही है।यानी फिलहाल तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक तरफ मंत्रालय का कहना है कि लाइब्रेरी के लिए जगह उपलब्ध कराई गई है और निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, जबकि पहले प्रस्तावित स्थान को संस्कृति मंत्रालय अपर्याप्त बता चुका है। इसी विरोधाभास और लाइब्रेरी के विशाल संग्रह के संरक्षण के सवाल ने मामले को महत्वपूर्ण बना दिया है।
सिर्फ किताबें नहीं, ऐतिहासिक दस्तावेज भी
इस लाइब्रेरी का महत्व केवल किताबों की संख्या तक सीमित नहीं है। यहां सरकारी प्रकाशनों के अलावा दुर्लभ पुस्तकें, पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। रिपोर्टों के मुताबिक यह 1984 से भारत सरकार के प्रकाशनों के लिए डिपॉजिटरी के रूप में भी काम कर रही है। सरकारी अधिकारियों के अलावा शोधकर्ताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए भी यह उपयोगी संसाधन रही है।इतने बड़े संग्रह को स्थानांतरित करना सामान्य शिफ्टिंग जैसा काम नहीं माना जा सकता। किताबों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त जगह के साथ तापमान, आर्द्रता, सुरक्षा, रिकॉर्ड प्रबंधन, कैटलॉगिंग और पाठकों के लिए सुविधाओं जैसी जरूरतों का भी ध्यान रखना पड़ता है। इसलिए नई इमारत का आकार और डिजाइन इस मामले में महत्वपूर्ण हो जाता है।
अब 5 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद इस मामले में आगे की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है। अदालत यह देख सकती है कि लाइब्रेरी के लिए प्रस्तावित व्यवस्था क्या उसके पूरे संग्रह और कामकाज के अनुकूल है तथा शास्त्री भवन खाली होने से पहले क्या उचित वैकल्पिक व्यवस्था तैयार है।फिलहाल सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी का भविष्य किसी किताब के बंद अध्याय जैसा नहीं हुआ है। सरकार के मुताबिक नए पुनर्विकास क्षेत्र में इसके लिए जगह का प्रावधान है, जबकि पर्याप्त स्थान और पूर्ण स्थानांतरण को लेकर पहले मंत्रालय स्तर पर आपत्ति सामने आ चुकी है। ऐसे में अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है, जहां 135 साल पुरानी इस संस्था और उसकी 8.5 लाख से ज्यादा किताबों के भविष्य को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है।
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